उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय मेरे लिए केवल SC, ST, OBC या General Category के बीच सीटों के वितरण का प्रश्न नहीं है।
मेरे लिए मूल प्रश्न इससे कहीं अधिक सीधा है:
यदि उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा बनाया गया कानून आरक्षण का स्पष्ट प्रतिशत निर्धारित करता है, तो क्या सरकार केवल Government Order जारी करके उस वैधानिक व्यवस्था को बदल सकती है?
मेरे विचार में उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
सरकार सामाजिक न्याय के लिए नीति बना सकती है। वंचित वर्गों के लिए विशेष योजनाएँ बना सकती है। लेकिन कार्यपालिका स्वयं को विधानमंडल से ऊपर नहीं रख सकती।
यही इस पूरे विवाद का मूल है।
मामला वास्तव में क्या था?
विवाद उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों—अम्बेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर—की MBBS admission seat matrix से उत्पन्न हुआ।
मामला Sabra Ahmad v. State of U.P. के रूप में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ पहुँचा। Single Judge के 25 अगस्त 2025 के निर्णय के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार ने Special Appeal No. 295 of 2025 — State of U.P. v. Sabra Ahmad दाखिल की। Division Bench ने 4 सितंबर 2025 को आदेश दिया।
विवादित व्यवस्था में इन मेडिकल कॉलेजों में सामान्य statutory reservation pattern से बहुत अलग seat distribution लागू किया जा रहा था।
उत्तर प्रदेश के Admission to Educational Institutions (Reservation for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Other Backward Classes) Act, 2006 के अनुसार reservation broadly था:
SC — 21% ST — 2% OBC — 27%
अर्थात कुल vertical reservation 50%।
लेकिन इन चार medical colleges में Special Component Plan से जुड़े Government Orders के आधार पर SC/ST के लिए अत्यधिक ऊँचा reservation structure लागू किया गया। विवादित State-quota matrix में प्रत्येक 85 seats में 62 SC, 5 ST, 11 OBC और केवल 7 Unreserved seats दिखाई गईं।
यानी 85 में केवल 7 Open/Unreserved seats।
यह लगभग:
8.24% Unreserved seats
बनता है।
यहीं से मेरे लिए पहला गंभीर प्रश्न उत्पन्न होता है।
कानून 21% कहता है तो Government Order 70% कैसे कर सकता है?
यहाँ मैं आरक्षण की आवश्यकता पर बहस नहीं कर रहा।
मैं कानून की बात कर रहा हूँ।
यदि Legislature ने एक Act बनाकर SC के लिए 21%, ST के लिए 2% और OBC के लिए 27% reservation निर्धारित किया है, तो Executive Government Order उससे ऊपर कैसे जा सकता है?
भारत में शासन की व्यवस्था स्पष्ट है:
Constitution → Legislation → Rules/valid delegated legislation → Executive action.
एक Government Order किसी Act के विपरीत नहीं चल सकता।
यही Rule of Law का आधार है।
इसलिए मेरे लिए प्रश्न यह नहीं है कि सरकार की भावना क्या थी।
हो सकता है उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े विद्यार्थियों की सहायता करना रहा हो।
लेकिन:
अच्छा उद्देश्य किसी अवैध साधन को वैध नहीं बना देता।
सामाजिक न्याय भी कानून के भीतर ही दिया जाना चाहिए।
फिर सरकार ने ऐसा क्यों किया?
राज्य का पक्ष था कि ये चार मेडिकल कॉलेज Special Component Plan के अन्तर्गत स्थापित किए गए थे और इनके निर्माण/वित्तपोषण का उद्देश्य SC/ST समुदायों को विशेष लाभ पहुँचाना था।
इसी background में Government Orders के माध्यम से विशेष reservation arrangement बनाया गया था।
मैं यहाँ सरकार के सामाजिक उद्देश्य पर प्रश्न नहीं उठा रहा।
मेरा प्रश्न उसके legal method पर है।
यदि सरकार वास्तव में मानती थी कि इन चार colleges की विशेष प्रकृति के कारण अलग reservation व्यवस्था आवश्यक है, तो उचित संवैधानिक मार्ग अपनाया जाना चाहिए था।
विधानमंडल के सामने प्रस्ताव रखिए।
कानून में आवश्यक संशोधन कीजिए।
उस संशोधन की संवैधानिक वैधता का परीक्षण होने दीजिए।
लेकिन existing Act को Government Order से practically बदल देना मेरे विचार में शासन का उचित मार्ग नहीं हो सकता।
Sabra Ahmad का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है
यह मामला केवल एक candidate की medical seat की लड़ाई नहीं था।
इसने उस administrative arrangement को चुनौती दी जिसके कारण statutory reservation framework से बहुत अलग seat matrix बन रही थी।
Single Judge ने Government Orders को उस सीमा तक स्वीकार नहीं किया जहाँ वे 2006 Act के विपरीत reservation लागू कर रहे थे।
और इसके बाद सरकार Division Bench में पहुँची।
यहीं एक बहुत महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ।
सरकार ने High Court में क्या कहा?
आपके साझा किए गए 4 सितंबर 2025 के Division Bench order का यह भाग मेरे लिए पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राज्य की ओर से Court में कहा गया कि सरकार Single Judge द्वारा तय किए गए legal points पर विवाद आगे नहीं बढ़ाना चाहती और अगले academic year से judgment लागू करने में उसे आपत्ति नहीं है।
लेकिन सरकार की चिंता तत्काल चल रही counselling को लेकर थी।
राज्य ने Court से कहा कि वर्तमान academic year की counselling को बीच में बदलने से पूरे Uttar Pradesh admission process में भारी अव्यवस्था उत्पन्न होगी और इसका प्रभाव दूसरे राज्यों तथा All India Quota तक पहुँच सकता है।
इसलिए State ने undertaking देने की बात कही कि:
2026-27 academic year से इन medical colleges में reservation 2006 Act के अनुसार strictly प्रदान किया जाएगा।
मेरे लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि सरकार ने यहाँ मूल legal principle को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी।
उसने मुख्यतः यह कहा:
इस वर्ष counselling पूरी होने दीजिए; अगले वर्ष से हम Act के अनुसार चलेंगे।
Court ने उसी वर्ष पूरी counselling क्यों नहीं रद्द की?
मेरे विचार में यहीं न्यायालय ने कानून और व्यावहारिक न्याय के बीच उचित संतुलन बनाया।
जब मामला Division Bench तक पहुँचा, admission process काफी आगे बढ़ चुका था।
हजारों students counselling और admission process से गुजर चुके थे।
यदि Court उसी समय पूरी प्रक्रिया उलट देता, तो ऐसे अनेक students प्रभावित होते जिन्होंने कोई गलती नहीं की थी।
विशेष रूप से SC candidates ने स्वयं reservation policy नहीं बनाई थी।
उन्होंने Government Order जारी नहीं किया था।
उन्होंने seat matrix नहीं बनाई थी।
उन्होंने सरकार द्वारा घोषित व्यवस्था के अनुसार NEET counselling में भाग लिया था।
इसलिए यदि प्रशासन ने कानून के विपरीत व्यवस्था बनाई भी थी, तो उसका पूरा दण्ड innocent students को देना भी न्याय नहीं होता।
मेरे लिए यही वास्तविक न्याय है।
सरकार की त्रुटि सुधारिए—लेकिन निर्दोष विद्यार्थी का भविष्य अनावश्यक रूप से नष्ट मत कीजिए।
लेकिन General/Open candidates के साथ क्या हुआ?
यह दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि 85 State-quota seats में केवल 7 seats Unreserved रखी गईं, तो इसका अर्थ है कि Open pool केवल लगभग 8.24% रह गया था।
यह असाधारण रूप से छोटा हिस्सा है।
इसका प्रभाव उन candidates पर पड़ना स्वाभाविक है जो Open competition के माध्यम से admission चाहते थे।
लेकिन यहाँ एक कानूनी distinction बहुत आवश्यक है।
Unreserved seat = केवल General-caste seat नहीं।
Open/Unreserved seat पर SC, ST और OBC candidate भी merit के आधार पर selection प्राप्त कर सकता है।
इसलिए यह कहना:
“General Category को केवल 8.24% reservation मिला”
कानूनी रूप से ठीक नहीं होगा।
General Category को कोई 8.24% “reservation” नहीं दिया गया था।
सही तथ्य यह है:
इन चार colleges की disputed State-quota seat matrix में केवल लगभग 8.24% seats Unreserved/Open थीं।
और क्योंकि Open seats सभी categories के लिए खुली होती हैं, General non-reserved candidate का वास्तविक final share इससे भी अलग हो सकता है।
यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है।
लेकिन क्या यह General Category के लिए वास्तविक असमानता का प्रश्न नहीं बनता?
मेरे विचार में बनता है—और इस प्रश्न को उठाना किसी आरक्षित समुदाय का विरोध नहीं है।
मान लीजिए किसी candidate के पास कोई reserved category benefit नहीं है।
वह केवल Open pool में compete कर सकता है।
दूसरी ओर reserved-category candidate के पास statutory reserved pool भी है और पर्याप्त merit होने पर Open pool में आने का अधिकार भी है।
यह वर्तमान legal structure है।
इसलिए यदि Executive action के कारण Open pool स्वयं 50% से घटकर लगभग 8% रह जाए, तो General non-reserved candidate के लिए competition अत्यन्त सीमित हो जाता है।
इसका परीक्षण आवश्यक है।
लेकिन इसका समाधान SC/ST/OBC candidates के Open-merit अधिकार को समाप्त करना नहीं है।
समाधान है—सरकार स्वयं statutory reservation limits का पालन करे।
यही इस case की सबसे बड़ी सीख है।
Merit को भी सही अर्थ में समझना होगा
मैं Merit और Social Justice को एक-दूसरे का शत्रु नहीं मानता।
ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित बच्चे को सहायता मिलनी चाहिए।
जिसके पास गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, coaching, पुस्तकें और संसाधन नहीं हैं, उसे आगे आने के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि Open competition इतना छोटा कर दिया जाए कि merit का वास्तविक क्षेत्र ही लगभग समाप्त हो जाए—विशेषकर तब, जब ऐसा किसी Legislature के संशोधित कानून से नहीं बल्कि executive orders से किया गया हो।
मेरे लिए उचित व्यवस्था है:
Social Justice + Equal Opportunity + Minimum Merit + Rule of Law
इनमें से किसी एक को हटाकर स्थायी न्याय नहीं बनाया जा सकता।
इस मामले में SC विद्यार्थियों को दोष देना भी गलत होगा
मैं यह बात विशेष रूप से स्पष्ट करना चाहता हूँ।
इस मामले को General बनाम SC बनाने का प्रयास गलत होगा।
यदि कोई SC student Government द्वारा घोषित reservation policy के अनुसार NEET counselling में admission प्राप्त करता है, तो उसने कोई अपराध नहीं किया।
गलती यदि हुई है तो policy-making और implementation के स्तर पर हुई है।
इसलिए मेरा प्रश्न विद्यार्थी से नहीं है।
मेरा प्रश्न सरकार से है।
यदि 2006 Act लागू था, तो उसके विपरीत Government Orders इतने वर्षों तक कैसे चलते रहे?
किस विभाग ने legal scrutiny की?
क्या Law Department से opinion लिया गया?
हर वर्ष medical counselling से पहले reservation matrix का statutory audit क्यों नहीं हुआ?
और यदि arrangement वास्तव में कानून के अनुरूप था, तो सरकार ने Division Bench के सामने अगले academic year से Act के अनुसार reservation लागू करने की undertaking क्यों दी?
ये प्रश्न सरकार को उत्तर देने चाहिए।
मेरे लिए सबसे चिंताजनक प्रश्न—यह व्यवस्था वर्षों तक कैसे चली?
इस controversy का सबसे गंभीर भाग केवल 2025 नहीं है।
Court proceedings से सामने आया कि यह विशेष reservation arrangement कई वर्षों से चला आ रहा था।
यहीं मेरे लिए institutional accountability का प्रश्न पैदा होता है।
यदि कोई administrative arrangement statutory Act से मेल नहीं खाता था, तो:
वर्षों तक किसी ने इसे review क्यों नहीं किया?
यदि review हुआ, तो उसका legal basis कहाँ है?
और यदि इसके कारण वर्षों तक Open seats कम रहीं, तो इसका cumulative effect क्या हुआ?
कितने candidates प्रभावित हुए?
यह संख्या अनुमान से नहीं बताई जानी चाहिए।
सरकार को data प्रकाशित करना चाहिए।
सरकार से मेरे सात सीधे प्रश्न
मेरे विचार में इस judgment के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को सार्वजनिक रूप से इन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए:
- 2006 Act के रहते इन चार medical colleges में अलग reservation structure किस स्पष्ट statutory authority के अन्तर्गत लागू किया गया?
- Government Orders जारी करने से पहले उनकी legal vetting किस स्तर पर हुई?
- यह व्यवस्था कितने academic years तक लागू रही?
- प्रत्येक वर्ष SC, ST, OBC और Open seats की वास्तविक संख्या क्या रही?
- Open seats में category-wise कितने candidates merit से selected हुए?
- इस विशेष arrangement का periodic legal review क्यों नहीं हुआ?
- 2026-27 से Act के अनुसार reservation लागू करने की undertaking के बाद क्या सरकार ने सभी medical colleges की reservation matrices का comprehensive audit कराया?
इनका उत्तर Reservation Reform की राष्ट्रीय बहस के लिए अत्यन्त उपयोगी होगा।
इसका बड़ा कानूनी implication क्या है?
मेरे विश्लेषण में इस judgment का सबसे महत्वपूर्ण संदेश Reservation percentage नहीं है।
संदेश है:
Executive Power की सीमा।
आज यह medical reservation का मामला है।
कल यही principle किसी recruitment, scholarship, admission, promotion या दूसरी public policy पर लागू हो सकता है।
यदि Legislature ने कानून बनाया है, तो Executive उस कानून को administrative order से बदल नहीं सकता।
सरकार को भी कानून का पालन करना होगा।
यही Constitutional Governance है।
और सामाजिक implication?
यदि सरकार कानून से बाहर जाकर किसी एक वर्ग को अतिरिक्त लाभ देती है, तो इसका परिणाम केवल दूसरे वर्ग के अवसरों में कमी नहीं होता।
इससे समाज में reservation के प्रति अविश्वास भी बढ़ता है।
लोग फिर यह मानने लगते हैं कि reservation के नियम राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलते हैं।
यह स्वयं सामाजिक न्याय के लिए हानिकारक है।
Reservation को legitimacy तभी मिलेगी जब जनता को विश्वास हो कि:
नियम स्पष्ट हैं। Data सार्वजनिक है। सीमाएँ कानून द्वारा निर्धारित हैं। Selection पारदर्शी है। और सरकार स्वयं उन्हीं नियमों का पालन करती है।
मेरे लिए यही Reservation Reform है
Reservation Reform का अर्थ reservation समाप्त करना नहीं है।
मेरे लिए Reform का अर्थ है:
Reservation according to law.
Benefit according to genuine disadvantage.
Transparent representation data.
Periodic review.
Equal opportunity.
Protection of merit.
और सबसे महत्वपूर्ण—
Government accountability.
यदि Legislature ने कोई सीमा निर्धारित की है, तो Executive उसका पालन करे।
यदि सरकार को वह सीमा बदलनी है, तो Legislature के पास जाए।
यदि constitutional amendment आवश्यक है, तो constitutional process अपनाए।
लेकिन administrative shortcut स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
मेरा निष्कर्ष
इस पूरे मामले को मैं एक बहुत सरल सिद्धान्त से देखता हूँ:
न्याय किसी एक वर्ग के लिए न्याय और दूसरे के लिए अन्याय नहीं हो सकता।
SC/ST/OBC के वास्तविक रूप से वंचित विद्यार्थियों को सहायता मिलनी चाहिए।
उनकी constitutional protection बनी रहनी चाहिए।
उनकी Open merit से प्राप्त उपलब्धि का भी सम्मान होना चाहिए।
लेकिन General non-reserved candidate के समान अवसर और merit को भी केवल इसलिए महत्वहीन नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास reserved category certificate नहीं है।
और इन सबके ऊपर—
सरकार कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
उत्तर प्रदेश का यह judgment इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह reservation के विरुद्ध नहीं, बल्कि reservation को कानून के अनुसार लागू करने की बात करता है।
यदि 2006 Act एक व्यवस्था निर्धारित करता है, तो उसका पालन होना चाहिए।
यदि बदलाव चाहिए, तो कानून बदलिए।
लेकिन Government Order से Legislature को bypass मत कीजिए।
और यदि किसी administrative निर्णय के कारण वर्षों तक असंतुलन पैदा हुआ है, तो उसका data जनता के सामने रखिए।
Social Justice without Rule of Law cannot be Justice.
Reservation without Review cannot remain beyond scrutiny.
Merit without Equal Opportunity is incomplete—but Equal Opportunity without Merit is also incomplete.
मेरे लिए सही मार्ग इन तीनों के बीच संतुलन है:
कानून • सामाजिक न्याय • योग्यता
और यही वास्तविक Reservation Reform है।
IRRF Global — The Global Voice of the Reservation Reform Movement Fairness Beyond Birth 🌐 www.irrfglobal.org
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